Friday, October 19, 2007

मीर का शेर, ग़ालिब की ग़ज़ल हो तुम,
तुम्हे देखकर लगता है कि-----
सांस लेती हुयी जिंदा ताजमहल हो तुम।

मेरी अर्ज़ तमन्ना भी अज़ब अर्ज़ तमन्ना है,
के तुझको मांगता हूँ और तुझी से मांगता हूँ।

मयकदे बंद करें लाख ज़माने वाले,
शहर मै और भी हैं आंखों से पिलाने वाले.

Thursday, October 18, 2007

मोहब्बत को समझना है नासेह तो खुद मोहब्बत कर
किनारे से कभी अंदाजा-ए-तूफाँ नहीं होता.